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बरेली का ‘अलंकार बनाम लखनऊ का अहंकार’

क्या उत्तर प्रदेश में अब एक PCS अफसर की आस्था उसके करियर का मृत्यु-पत्र बन चुकी है?
क्या उत्तर प्रदेश की ब्यूरोक्रेसी अब उस दौर में प्रवेश कर चुकी है,
जहाँ आस्था अपराध है,
स्वाभिमान मानसिक बीमारी,
और सवाल पूछना पागलपन का प्रमाण?
बरेली से उठी यह कहानी किसी एक PCS अफसर की नहीं है।
यह उस सिस्टम की परतें उधेड़ती है,
जो बाहर से अनुशासन और भीतर से दमन पर चलता है।
बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा
महज एक प्रशासनिक निर्णय नहीं,
बल्कि उस गुलाम तंत्र के खिलाफ खुला विद्रोह है
जो अपने ही अफसरों को कुचलने से नहीं हिचकता।
इस्तीफा नहीं, सिस्टम के खिलाफ शंखनाद
2019 बैच, 15वीं रैंक।
जिस अफसर को सिस्टम की रीढ़ कहा जाना चाहिए था,
उसे सिस्टम ने “पागल” करार देने की कोशिश की।
अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे में साफ लिखा—
जब प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शिष्यों की चोटी पकड़ी गई,
तो उनका रोम-रोम कांप उठा।
उनका सवाल सीधा था—
“क्या यह केवल अपमान है या किसी बड़े सांस्कृतिक दमन की शुरुआत?”
यही सवाल सत्ता को चुभ गया।
डीएम आवास या ‘डिटेंशन सेंटर’?
अलंकार का दावा है कि
उन्हें डीएम आवास पर ‘वार्ता’ के बहाने बुलाया गया,
लेकिन वहां जो हुआ वह वार्ता नहीं,
बल्कि आइसोलेशन टैक्टिक थी।
सहयोगी को बाहर निकाल दिया गया
कमरे में अकेला कर दिया गया
दबाव बनाया गया कि इस्तीफे का कारण
“मानसिक तनाव” बताया जाए
क्यों?
क्योंकि अगर यह सच सामने आ गया कि
एक PCS अफसर ने शंकराचार्य के अपमान और ब्राह्मणों की उपेक्षा के विरोध में इस्तीफा दिया है,
तो लखनऊ से दिल्ली तक
सत्ता की कुर्सियाँ हिल सकती थीं।
“साला पंडित पागल हो गया है…” — सत्ता की असली भाषा
अलंकार के अनुसार,
उसी कमरे में लखनऊ से एक ‘पावरफुल’ नाम का फोन आता है।
फोन स्पीकर पर था।
और उधर से आवाज आती है—
“साला पंडित पागल हो गया है, इसे रात भर बंधक बनाकर रखो, जाने मत देना!”
यह कोई गाली नहीं थी।
यह सिस्टम का मानसिक चरित्र प्रमाणपत्र था।
सवाल उठता है—
क्या योग्यता का पैमाना अब
लखनऊ की गालियों से तय होगा?
इस्तीफे के बाद बदले की राजनीति
इस्तीफा दिए जाने के बाद
बदले की रफ्तार ने सभी सीमाएं तोड़ दीं—
2 घंटे के भीतर सरकारी आवास खाली करने का आदेश
रात के अंधेरे में पुलिस कार्रवाई
घर का टेंट उखाड़ दिया गया
जैसे कोई अफसर नहीं,
कोई खूंखार अपराधी हो।
यह प्रशासनिक प्रक्रिया थी
या सत्ता की असुरक्षा?
राजनीति, समाज और सनातन की प्रतिक्रिया
इस पूरे घटनाक्रम ने
यूपी की राजनीति और समाज को झकझोर दिया है।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय ने
अलंकार को फोन कर कहा—
“भाई, हम आपके साथ हैं।”
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे
“सनातन प्रेमियों के हृदय पर गहरी चोट” बताया।
उत्तर प्रदेश की 12% ब्राह्मण आबादी
आज बरेली की ओर सवाल भरी नजरों से देख रही है।
अलंकार का 5 पेज का पत्र: सत्ता के लिए चार्जशीट
अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा-पत्र
किसी साधारण नोट से कहीं ज्यादा है।
यह एक चार्जशीट है—
सत्ता के अहंकार के खिलाफ
अफसरशाही के दमन के खिलाफ
सांस्कृतिक अपमान के खिलाफ
उन्होंने साफ लिखा—
“अगर आज संतों की चोटी पकड़ी जा रही है,
तो कल किसकी बारी होगी?”
Akhileaks का सीधा सवाल
आज Akhileaks यूपी की सत्ता और अफसरशाही से सीधे सवाल करता है—
क्या अब अफसरों को अपनी आस्था घर पर ताले में बंद करके दफ्तर आना होगा?
क्या किसी को ‘पागल’ करार देना अब प्रशासनिक हथियार बन गया है?
क्या स्वाभिमान अब सेवा नियमों के खिलाफ है?
निष्कर्ष: सच का अलंकार
अलंकार अग्निहोत्री ने
अपनी कुर्सी नहीं बचाई,
लेकिन सिस्टम का मुखौटा उतार दिया।
अब जवाब
बरेली को नहीं,
लखनऊ को देना है।

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