मोहन यादव की दिल्ली वाली ‘लाइफलाइन’ कट गई?
जेपी नड्डा के जाते ही क्यों अटक गई निगम-मंडलों की फाइल, और कैसे बदला सत्ता का समीकरण
भूमिका: जब दिल्ली खामोश होती है, तो भोपाल बेचैन हो जाता है
राजनीति में कुछ फैसले शोर से नहीं, खामोशी से होते हैं। और जब खामोशी दिल्ली से आती है, तो उसके झटके भोपाल तक महसूस होते हैं।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ इस वक्त कुछ ऐसा ही हो रहा है।
जिस निगम-मंडल नियुक्ति सूची को भोपाल में ‘डन डील’ माना जा रहा था, जिस पर समर्थकों को मिठाई खिलाने की तैयारी थी—वही लिस्ट दिल्ली में होल्ड कर दी गई। और यह होल्ड किसी मामूली अफसर ने नहीं, बल्कि बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने किया है।
सवाल सीधा है—
क्या यह सिर्फ एक प्रशासनिक देरी है, या फिर मोहन यादव के राजनीतिक ग्राफ में गिरावट का पहला बड़ा संकेत?
नड्डा का जाना, मोहन के लिए क्यों बना ‘पर्सनल झटका’?
भोपाल के सियासी गलियारों में यह कोई रहस्य नहीं था कि मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाने में जेपी नड्डा की भूमिका निर्णायक रही थी।
यह समर्थन केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत भी था।
‘राखी का रिश्ता’—जो VIP पास बन गया
जेपी नड्डा की पत्नी मल्लिका नड्डा और मोहन यादव के बीच वर्षों पुराना पारिवारिक-सामाजिक संबंध रहा है। मल्लिका नड्डा, मोहन यादव को अपना भाई मानती हैं और सार्वजनिक तौर पर उन्हें राखी बांधती रही हैं।
राजनीति में यह रिश्ता सिर्फ भावनात्मक नहीं था—यह दिल्ली दरबार तक पहुंच का शॉर्टकट भी था।
यही कारण था कि:
मोहन यादव को सीएम पद के शुरुआती महीनों में फ्री हैंड मिला
संगठन और सरकार के बीच टकराव नहीं दिखा
दिल्ली से कोई बड़ा ‘कट’ या ‘कररेक्शन’ नहीं आया
निगम-मंडल लिस्ट: एक कागज, कई संकेत
निगम-मंडल नियुक्तियां किसी भी राज्य सरकार के लिए केवल पद वितरण नहीं होतीं, बल्कि यह तय करती हैं कि:
मुख्यमंत्री किस हद तक अपनी टीम बना सकता है
संगठन में उसका इकबाल कितना है
कौन उसके साथ है और कौन सिर्फ मजबूरी में
मोहन यादव चाहते थे कि जेपी नड्डा के अध्यक्ष रहते-रहते यह लिस्ट पास हो जाए, ताकि:
उनके समर्थकों को सुरक्षित पद मिल जाए
दिल्ली से यह संदेश जाए कि सरकार पूरी तरह कंट्रोल में है
लेकिन तभी राजनीति ने करवट ली।
नितिन नवीन की एंट्री और पहला बड़ा संदेश
जेपी नड्डा के जाने के बाद पार्टी की कमान नितिन नवीन के हाथ में आई।
नितिन नवीन का प्रोफाइल साफ है—
प्रोफेशनल
सख्त
भावनात्मक रिश्तों से दूर
संगठन को सर्वोपरि रखने वाले
सूत्रों के मुताबिक, चार्ज लेते ही नितिन नवीन ने स्पष्ट कर दिया कि राज्यों की सभी नियुक्तियां नए सिरे से रिव्यू होंगी।
इसी क्रम में मोहन यादव की भेजी गई निगम-मंडल लिस्ट पर होल्ड लगा दिया गया।
यह महज फाइल रोकना नहीं था—
यह एक पॉलिटिकल मैसेज था:
“पुराना VIP पास अब इनवैलिड है। अब सब कुछ नए नियमों से होगा।”
खतरे की घंटी क्यों बज रही है?
राजनीति का एक अलिखित नियम है—
जो मुख्यमंत्री अपनी टीम नहीं बना पाता, उसकी कुर्सी अस्थिर मानी जाती है।
यदि:
सीएम की पसंद के नाम काटे जाते हैं
दिल्ली अपने लोग एडजस्ट कराती है
लिस्ट में बड़े बदलाव होते हैं
तो इसका सीधा मतलब होगा कि मोहन यादव दिल्ली में कमजोर पड़ चुके हैं।
‘फ्री हैंड’ से ‘रिमोट कंट्रोल’ की ओर?
जेपी नड्डा के दौर में मोहन यादव को निर्णयों की आज़ादी थी।
लेकिन नितिन नवीन का यह पहला कदम संकेत देता है कि:
अब फैसले सेंट्रलाइज हो सकते हैं
भोपाल से ज्यादा कंट्रोल दिल्ली में रहेगा
मुख्यमंत्री की स्वायत्तता सीमित हो सकती है
क्या यह मोहन यादव के बुरे वक्त की शुरुआत है?
फिलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि मोहन यादव की कुर्सी खतरे में है।
लेकिन इतना तय है कि:
उनकी दिल्ली वाली ‘लाइफलाइन’ कमजोर हुई है
संगठन में उनकी नेगोशिएटिंग पावर कम हुई है
आने वाले फैसले उनकी राजनीतिक परीक्षा लेंगे
अब असली सवाल यह है—
क्या मोहन यादव नए अध्यक्ष के साथ नई केमिस्ट्री बना पाएंगे?
या फिर उन्हें अपनी ही भेजी लिस्ट पर समझौता करना पड़ेगा?
निष्कर्ष: राजनीति में रिश्ते नहीं, रियलिटी चलती है
‘राखी का रिश्ता’ एक दौर में ताकत था,
लेकिन राजनीति में रिश्तों की एक्सपायरी डेट होती है।
नितिन नवीन ने साफ कर दिया है कि वे रबर-स्टैम्प अध्यक्ष नहीं होंगे।
और यह साफ संकेत है कि अब मध्य प्रदेश की राजनीति में नया पावर गेम शुरू हो चुका है।
मोहन यादव इस खेल में कैसे खुद को बचाते हैं—
यही आने वाले दिनों की सबसे बड़ी कहानी होगी।



