जुर्म एक, सलूक दो: क्या मध्य प्रदेश में न्याय अब चेहरा देखकर तय होता है?
राजनीति में कहा जाता है कि ‘टाइमिंग’ और ‘टार्गेट’ ही तय करते हैं कि तूफ़ान आएगा या सन्नाटा छा जाएगा।
मध्य प्रदेश में बीते कुछ दिनों में ऐसे ही दो बयान सामने आए—दोनों नफरत से भरे, दोनों समाज को तोड़ने वाले, दोनों संविधान की भावना पर चोट करने वाले।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक बयान पर सरकार ने पूरा तंत्र झोंक दिया, और दूसरे पर ऐसी चुप्पी साध ली गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
आज Akhileaks की इस विशेष रिपोर्ट में हम वही सवाल उठा रहे हैं, जो प्रदेश की जनता के मन में गूंज रहा है—
क्या मध्य प्रदेश में न्याय की परिभाषा बदल चुकी है?
क्या अब अपराध की गंभीरता नहीं, बल्कि अपराधी का कद और पद तय करता है कि पुतला जलेगा या सिर्फ फाइल चलेगी?
आज का मुद्दा है—
फूल सिंह बरैया बनाम संतोष वर्मा: जुर्म एक, सलूक दो!
पहला मामला: जब पूरा सिस्टम ‘एक्शन मोड’ में दिखा
कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया द्वारा महिलाओं को लेकर की गई अमर्यादित टिप्पणी के बाद, सरकार की प्रतिक्रिया न सिर्फ तेज़ थी बल्कि आक्रामक भी।
यह मामला सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बीजेपी के लिए एक बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया।
मुख्यमंत्री का हमला:
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सीधे राहुल गांधी और सोनिया गांधी को कटघरे में खड़ा कर दिया।
संगठन की सक्रियता:
प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल से लेकर बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं तक, हर कोई बरैया के खिलाफ मैदान में उतर आया।
सड़कों पर संग्राम:
भोपाल के बोर्ड ऑफिस चौराहे से लेकर इंदौर और ग्वालियर तक, बीजेपी महिला मोर्चा ने पुतले फूंके, नारे लगाए, माफी और निष्कासन की मांग की।
यह गुस्सा स्वाभाविक भी है और जरूरी भी, क्योंकि नारी सम्मान से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहीं से असली सवाल जन्म लेता है—
क्या यह गुस्सा सच में नारी सम्मान के लिए था, या इसलिए ज्यादा तीखा था क्योंकि सामने खड़ा व्यक्ति ‘विपक्ष’ से था?
दूसरा मामला: जब बयान जहरीला था, लेकिन सरकार खामोश रही
अब ज़रा इस तस्वीर का दूसरा पहलू देखिए।
23 नवंबर को भोपाल में एक सार्वजनिक मंच से IAS अधिकारी संतोष वर्मा ने कहा—
“जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान न कर दे, तब तक आरक्षण मिलना चाहिए।”
इस एक वाक्य में कितनी परतें छुपी हैं—
संविधान की आत्मा का मज़ाक,
एक पूरे समाज की बेटियों को ‘दान’ की वस्तु मानने वाली सामंती सोच,
और एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी की बेलगाम मानसिकता।
लेकिन इसके बाद क्या हुआ?
क्या किसी मंत्री ने बर्खास्तगी की मांग की?
क्या बीजेपी महिला मोर्चा सड़कों पर उतरा?
क्या सरकार ने तत्काल कार्रवाई का प्रदर्शन किया?
जवाब है—नहीं।
टाइमलाइन जो दोहरा रवैया उजागर करती है
23 नवंबर: बयान दिया गया
दिसंबर का पहला हफ्ता: सोशल मीडिया पर विरोध शुरू
दिसंबर मध्य: 65 ब्राह्मण संगठनों ने मंत्रालय घेराव की चेतावनी दी
जनवरी (अब): सरकार ने दबाव में आकर बर्खास्तगी का प्रस्ताव केंद्र को भेजा
यहां फर्क साफ दिखता है।
बरैया के मामले में सरकार खुद आगे बढ़कर हमला करती है,
जबकि वर्मा के मामले में सरकार को जगाने के लिए समाज को अल्टीमेटम देना पड़ता है।
कार्रवाई दोनों जगह हुई—लेकिन शोर, आक्रोश और नैरेटिव सिर्फ एक तरफ था।
ऐसा लगता है मानो सरकार चाहती है कि यह मामला चुपचाप निपट जाए, बिना किसी राजनीतिक नुकसान के।
Akhileaks Analysis: इस दोहरे रवैये की असली वजहें
हमारे सूत्रों और विश्लेषण के मुताबिक, इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं—
1️⃣ सॉफ्ट टार्गेट बनाम सिस्टम
फूल सिंह बरैया विपक्षी विधायक हैं।
उन पर हमला करने से बीजेपी को दलित और महिला वोट बैंक में सीधा फायदा दिखता है।
उन्हें घेरना आसान है।
2️⃣ ब्यूरोक्रेसी का बचाव
संतोष वर्मा ‘सिस्टम’ का हिस्सा हैं।
अगर सरकार अपने ही अफसर के खिलाफ सड़कों पर उतर आए, तो सवाल सरकार के कंट्रोल पर उठेंगे।
इसलिए ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की आड़ में मामला ठंडा करने की कोशिश होती है।
जनता सवाल पूछ रही है
सोशल मीडिया पर लोग साफ पूछ रहे हैं—
अगर बरैया का बयान ‘जहर’ था, तो वर्मा का बयान क्या ‘अमृत’ था?
ब्राह्मण समाज का आक्रोश यह साबित करता है कि
सिर्फ फाइल भेज देना काफी नहीं है।
अगर सरकार की नीयत साफ है, तो
जैसे बरैया के खिलाफ अभियान चला,
वैसे ही बदजुबान और बेलगाम अफसरों के खिलाफ भी ‘हल्ला बोल’ होना चाहिए।
मुख्यमंत्री से सीधा सवाल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जी,
आप एक सख्त प्रशासक की छवि रखते हैं।
प्रदेश की जनता आपसे यही उम्मीद करती है कि—
अपमान—चाहे महिला का हो, दलित का हो या ब्राह्मण का—अपमान ही होता है
और अपराधी—चाहे खादी पहने हो या सूट-बूट वाला अफसर—अपराधी ही होता है
अब देखना यह है कि
केंद्र सरकार संतोष वर्मा की फाइल पर कितनी जल्दी मुहर लगाती है,
या यह मामला भी लालफीताशाही में उलझकर रह जाएगा।
और साथ ही सवाल यह भी है—
क्या कांग्रेस उतनी ही जोर से संतोष वर्मा का विरोध करेगी, जितना बीजेपी बरैया का कर रही है?
निष्कर्ष | Akhileaks View
‘जुर्म एक, सजा दो’ का यह खेल अब बंद होना चाहिए।
न्याय अगर चयनात्मक हुआ, तो विश्वास टूटेगा—और टूटा हुआ विश्वास सबसे खतरनाक होता है।



