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लाड़ली बहना से देवी सुभद्रा: मामा से मोहन तक, मध्यप्रदेश की नई राजनीतिक कथा

नाम बदला, लेकिन राजनीति का अर्थ गहरा हुआ

मध्यप्रदेश की सबसे लोकप्रिय योजना “लाड़ली बहना” अब इतिहास बनने जा रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इसे अब एक नए नाम से आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं —
“देवी सुभद्रा योजना।”

यह सिर्फ एक योजना का नाम बदलना नहीं, बल्कि
प्रदेश की राजनीतिक दिशा और वैचारिक पहचान बदलने की कोशिश है।
“मामा” की भावनात्मक राजनीति अब “मोहन” की सांस्कृतिक राजनीति में रूपांतरित हो रही है।

शिवराज का दौर: ममता और भावना की राजनीति

मार्च 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने
लाड़ली बहना योजना शुरू की थी।
इसका उद्देश्य था — महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और
उन्हें परिवार के केंद्र में लाना।

1000 रुपये की शुरुआत हुई, फिर सितंबर 2023 में राशि बढ़कर 1250 रुपये हुई।
योजना ने ग्रामीण महिलाओं में गहरी पैठ बनाई और
शिवराज को “मामा” के रूप में भावनात्मक पहचान दी।

कहा जा सकता है कि

“लाड़ली बहना योजना, शिवराज की राजनीति की सबसे बड़ी भावनात्मक संपत्ति थी।”

मोहन यादव का युग: धर्म और संस्कृति की राजनीति

अब 2025 में जब मुख्यमंत्री मोहन यादव ने
इसी योजना का नाम बदलकर “देवी सुभद्रा योजना” करने की घोषणा की,
तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रहा।

“सुभद्रा” — श्रीकृष्ण की बहन।
और श्रीकृष्ण का एक नाम — “मोहन।”

यह संयोग नहीं, सांस्कृतिक समानांतरता है।
अब जहां पहले “मामा की लाड़ली” थी,
वहीं अब “मोहन की सुभद्रा” बन रही है।

यह बदलाव बताता है कि
मोहन यादव अपनी पहचान को शिवराज की छाया से बाहर निकालकर
“धर्मनिष्ठ, संस्कारप्रधान” नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं।

संघ का दृष्टिकोण: राजनीति में संस्कृति का समावेश

RSS की विचारधारा हमेशा से यह रही है कि
“राजनीति केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि संस्कृति संरक्षण का माध्यम होनी चाहिए।”

मोहन यादव स्वयं संघ पृष्ठभूमि से आते हैं।
उनका फोकस प्रशासन से ज्यादा सांस्कृतिक पुनर्जागरण पर है।

“देवी सुभद्रा योजना” इसी सोच की उपज है —
जहां महिला सशक्तिकरण को धार्मिक गौरव और राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा जा रहा है।

अब हर महिला सिर्फ लाभार्थी नहीं,
बल्कि “संस्कार और शक्ति” की प्रतीक — सुभद्रा के रूप में देखी जा रही है।

आर्थिक पहलू: खर्च नहीं, निवेश है

1250 से बढ़ाकर 1500 रुपये प्रतिमाह की सहायता।
1.26 करोड़ महिलाएं योजना से जुड़ी हुई हैं।
कुल खर्च — लगभग 20,450 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष।
सरकार पर अतिरिक्त बोझ — 1793 करोड़ रुपये।

लेकिन इसे “वित्तीय बोझ” नहीं, बल्कि राजनीतिक निवेश कहा जा रहा है।
क्योंकि हर महीने पैसा भेजने के साथ
मोहन यादव का नाम अब सीधे जनता के खातों तक पहुंचेगा।

साथ ही सरकार नई महिला बीमा योजना पर भी काम कर रही है —
जिसमें स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों का कवच शामिल होगा।

सिवनी से संदेश: संस्कृति की भूमि से योजना का पुनर्जन्म

मुख्यमंत्री मोहन यादव इस योजना की घोषणा 12 नवंबर को सिवनी में करेंगे।
सिवनी — वह धार्मिक भूमि जो नर्मदा संस्कृति और जन आस्था दोनों से जुड़ी है।

मोहन यादव यहां से एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं —
कि अब मध्यप्रदेश “विकास मॉडल” से आगे बढ़कर
“संस्कृति मॉडल” की दिशा में जाएगा।

मामा की छाया से बाहर, मोहन की माया में प्रवेश

मोहन यादव जानते हैं —
शिवराज की “मामा” छवि इतनी गहरी है कि उसे मिटाना आसान नहीं।
इसलिए उन्होंने उसे बदलने की नहीं, रूपांतरित करने की रणनीति चुनी है।

“मामा” रिश्ते की भावना थी,
“मोहन” श्रद्धा और शक्ति का प्रतीक है।

अब यह राजनीति परिवार की भावना से आगे बढ़कर
धर्म, संस्कृति और विचार की जमीन पर पहुंच चुकी है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया और जनता का मन

कांग्रेस का कहना है —

“योजना वही है, बस नाम और फोटो बदल दिए गए।”

लेकिन सच्चाई यह है कि
250 रुपये की बढ़ोतरी छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की महिलाओं के लिए
एक भावनात्मक राहत है।

नाम में “देवी” जुड़ने से योजना को आध्यात्मिक मान्यता भी मिली है।
जनता यह नहीं देखती कि पैसा कहां से आया,
वह देखती है — किसने दिया।

और यही राजनीति की नई परिभाषा है —
मोहन = विश्वास का नया प्रतीक।

Akhileaks विश्लेषण: युग परिवर्तन की घोषणा

Akhileaks के विश्लेषण में
“देवी सुभद्रा योजना” सिर्फ एक योजना नहीं,
बल्कि राजनीतिक पुनर्जन्म की कथा है।

> शिवराज का दौर “ममता और भावनाओं” का था।
मोहन का दौर “संस्कार और शक्ति” का होगा।

RSS और दिल्ली — दोनों ही इस बदलाव के पक्ष में हैं।
मोहन यादव अब सिर्फ मुख्यमंत्री नहीं,
बल्कि संस्कृति के संरक्षक के रूप में उभर रहे हैं।

 निष्कर्ष: मामा से मोहन तक

“लाड़ली बहना” शिवराज सिंह चौहान का युग थी।
“देवी सुभद्रा” मोहन यादव का आरंभ है।

नाम बदला है, पर राजनीति की दिशा नहीं —
बस कहानी अब “मामा की नहीं, मोहन की माया” की है।

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