Women Power: बिहार चुनाव 2025 की सबसे बड़ी कहानी — अबकी बार महिलाओं ने तय किया खेल
राजनीति में महिलाएं नहीं, अब ‘निर्णयकर्ता’
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान खत्म हो चुका है, और इस बार मैदान से जो सबसे बड़ा संदेश निकला है, वह यह है कि महिलाएं अब सिर्फ लाइन में नहीं, बल्कि राजनीति की दिशा तय करने वाली सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं।
64.46% मतदान — बिहार की महिला शक्ति का रिकॉर्ड
पहले चरण में 121 सीटों पर हुए मतदान में शाम 6 बजे तक 64.46% वोटिंग दर्ज की गई — जो 2020 के मुकाबले करीब 7% ज़्यादा है।
निर्वाचन आयोग ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ़ कहा कि महिलाओं की भागीदारी ऐतिहासिक रही है, और कई इलाकों में पुरुषों से ज़्यादा महिला मतदाताओं ने वोट डाला।
पटना के कुम्हरार बूथ 223 पर दोपहर 3 बजे तक 25 महिलाएं और सिर्फ़ 2 पुरुष लाइन में थे — यह दृश्य अब पूरे बिहार का प्रतीक बन चुका है।
2005 से 2025: महिला वोट की ‘शांति से आई क्रांति’
बिहार में महिला वोटिंग का ट्रेंड नीतीश कुमार के शासनकाल से शुरू हुआ।
साइकिल योजना, छात्रवृत्ति, पंचायत आरक्षण, और जीविका समूहों ने महिलाओं को सामाजिक पहचान दी।
धीरे-धीरे यह पहचान अब राजनीतिक शक्ति में बदल गई है।
अब महिला वोट भावनाओं या जातीय निष्ठा पर नहीं, बल्कि सुरक्षा, स्थिरता और सुविधा के आधार पर तय होता है।
महिला वोट अब ‘लाभार्थी’ नहीं, ‘निर्णायक’ बन चुका है
2025 के पहले चरण ने यह साफ़ कर दिया कि महिला वोटर अब सरकार की योजनाओं को केवल सुविधा नहीं, बल्कि विश्वास के रूप में देखती हैं।
नीतीश कुमार का “जीविका नेटवर्क” — जो 1.3 करोड़ महिलाओं तक फैला है — इस बार भी बूथ स्तर पर सक्रिय रहा।
वहीं BJP की “लाभार्थी पॉलिटिक्स” ने महिलाओं के बीच एक मानसिक भरोसा तैयार किया।
प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक हर भाषण में “महिलाओं”, “लाभार्थियों”, “गैस”, “आवास” और “सुरक्षा” की बात दोहराई गई — जिसने महिलाओं के भीतर राजनीतिक आत्मविश्वास पैदा किया।
RJD और कांग्रेस गठबंधन का मिस्ड कनेक्शन
विपक्ष (RJD–कांग्रेस) का फोकस रोजगार, महंगाई और सामाजिक न्याय रहा,
लेकिन महिला मतदाताओं के साथ कोई ठोस भावनात्मक नैरेटिव नहीं बन पाया।
गांवों में महिलाएं आज सरकार से सीधे जुड़े लाभों को महसूस कर रही हैं —
राशन, उज्ज्वला गैस, आवास, छात्रवृत्ति, पेंशन, स्कूल भोजन — और यही जुड़ाव अब वोट में तब्दील हो रहा है।
आंकड़े क्या कहते हैं?
- कुल मतदान: 64.46%
- महिलाओं की भागीदारी: 65%–68% (कुछ जिलों में 70%)
- NDA का अनुमानित प्रदर्शन: 65–70 सीटें
- RJD–कांग्रेस गठबंधन: 45–50 सीटें
- मुख्य मतदान क्षेत्र: गया, औरंगाबाद, भोजपुर, कैमूर, बक्सर, जहानाबाद, अरवल
- यह क्षेत्र परंपरागत रूप से डबल फ्रंट वोटिंग के लिए जाना जाता है, लेकिन इस बार महिला वोट बैंक ने जातीय गणित को पलट दिया है।
NDA की बढ़त का आधार — Women Wave
इस बार का महिला टर्नआउट तीन स्तरों पर NDA के पक्ष में गया दिखता है:
सामाजिक भरोसा – “जीविका दीदी” नेटवर्क के माध्यम से जमीनी कनेक्ट।
विकासात्मक लाभ – डीबीटी, उज्ज्वला, आवास और छात्रवृत्ति की डायरेक्ट डिलीवरी।
सुरक्षा का मनोविज्ञान – महिलाएं अब स्थिरता को प्राथमिकता देती हैं।
जाति नहीं, अनुभव निर्णायक
इस बार महिलाओं ने पारंपरिक जातीय सीमाओं को पार किया है।
कुर्मी, यादव, कोइरी, मुस्लिम — हर वर्ग की महिलाएं अब अपने अनुभव से वोट डाल रही हैं, जातीय निर्देश से नहीं।
महिला वोट अब “कास्ट” से नहीं, “क्लास ऑफ कॉन्फिडेंस” से तय होता है।
विपक्ष की चुनौती: भावनात्मक जुड़ाव की कमी
अब विपक्ष दूसरे चरण में महिला वोट बैंक को वापस जोड़ने की कोशिश करेगा।
महंगाई, गैस सिलेंडर की कीमतें और रोज़गार जैसे मुद्दों पर नया नैरेटिव बनाया जा रहा है।
लेकिन सवाल यही है — क्या वे “लाभार्थी भरोसे” के मुकाबले भावनात्मक कनेक्शन बना पाएंगे?
ग्राउंड रिपोर्ट्स से संकेत
Akhileaks की टीम को मैदान से जो डेटा और वॉयस मिले, वे बताते हैं —
“पहले डर लगता था, अब हम खुद वोट डालने जा रहे हैं,”
“सरकार ने गैस दी, घर बनाया, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाया।”
इन लाइनों में सिर्फ़ संतोष नहीं, राजनीतिक आत्मविश्वास झलकता है।
निष्कर्ष: Women Power – The Real Kingmaker of Bihar
2025 के बिहार चुनाव का पहला चरण यह साफ़ कर गया है कि अब राजनीति में महिलाओं को नारा नहीं, निर्णायक मानना होगा।
यह सिर्फ़ 64.46% वोटिंग नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन की गवाही है।
बिहार की महिलाएं अब सिर्फ़ वोट नहीं डालतीं — सरकारें बनाती हैं।
और यही है बिहार की सबसे बड़ी कहानी



