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मोहन यादव का आरक्षण दांव: मोदी के GYAN मॉडल को चुनौती और बीजेपी की जातीय उलझन

प्रस्तावना: सत्ता की नई पटकथा

जब मुख्यमंत्री मोहन यादव को मध्य प्रदेश की कमान सौंपी गई थी, तो बीजेपी का मकसद साफ़ था — “80 बनाम 20” की राजनीति को और मज़बूत करना। मोहन यादव को “हार्ड हिंदुत्व” के प्रतीक चेहरे के रूप में प्रस्तुत किया गया — संघ की पृष्ठभूमि, गाय-गंगा से जुड़ी छवि, और मालवा की धार्मिक ज़मीन से उठी पहचान। लेकिन अब वही मोहन यादव, सत्ता में कुछ ही महीनों बाद, उस हिंदुत्व की धुरी से हटकर “आरक्षण राजनीति” की ओर बढ़ गए हैं — और यही मोड़ बीजेपी के भीतर सबसे बड़ी वैचारिक हलचल पैदा कर रहा है।

ओबीसी कार्ड: शिवराज की ताकत, मोहन का कवच

मोहन यादव ने महसूस किया कि हिंदुत्व की राजनीति में उनकी व्यक्तिगत पहचान सीमित है।
उनके पास “शिवराज सिंह चौहान मॉडल” से सीखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था —
जहाँ ओबीसी पहचान ने शिवराज को दो दशक तक सत्ता में टिकाए रखा।
इसलिए यादव ने 27% ओबीसी आरक्षण का कार्ड खेला।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में “रोज़ाना सुनवाई” की मांग उठाई, खुद को “ओबीसी समाज का बेटा” बताया, और बीजेपी के भीतर अपने लिए एक नया सामाजिक कवच तैयार किया।
पर यही दांव अब उल्टा पड़ता दिख रहा है।

आरक्षण का जिन्न और स्वर्ण असंतोष

आरक्षण की बहस जैसे ही दोबारा जगी —
ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ और भूमिहार समाज में यह संदेश गया कि “मोहन यादव अब हिंदू एकता नहीं, जातीय राजनीति कर रहे हैं।”
जो नेता संघ की पसंद थे, अब जातिगत असंतुलन के प्रतीक बनते दिख रहे हैं।

पार्टी के भीतर इसे “कुर्सी बचाओ राजनीति” कहा जा रहा है —
क्योंकि यादव ने जिस मुद्दे को उठाया, उसने न सिर्फ़ प्रदेश बल्कि बीजेपी के राष्ट्रीय नैरेटिव को भी डगमगा दिया है।

मोदी का “GYAN मॉडल” बनाम यादव का “आरक्षण मॉडल”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से जातीय राजनीति से ऊपर उठकर वर्गीय एकता की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनका नया सूत्र है — “GYAN”: गरीब, युवा, अन्नदाता, नारीशक्ति।

यह मॉडल जातियों को नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक वर्गों को जोड़ता है।
मोहन यादव का कदम इस सोच के ठीक उलट गया —
उन्होंने जाति आधारित आरक्षण को पुनर्जीवित कर दिया, जिससे मोदी के “क्लास-आधारित राष्ट्रवाद” को वैचारिक झटका लगा।

दिल्ली दरबार में बेचैनी और नागपुर की असहजता

मोहन यादव का यह कदम सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, विचारधारात्मक संकट भी बन गया है।
दिल्ली दरबार में यह सवाल गूंज रहा है —

 “क्या मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं, या सिर्फ़ ओबीसी नेता?”

नागपुर (संघ मुख्यालय) से लेकर दिल्ली (पार्टी केंद्र) तक असहजता साफ़ दिख रही है।
क्योंकि जिस चेहरे को संघ ने “संघनिष्ठ हिंदू प्रतीक” के रूप में गढ़ा था, वही अब जातीय पहचान के सहारे अपनी राजनीति बचाने में जुटा है।

पेरियारवादी वकील की नियुक्ति: हिंदुत्व के खिलाफ़ पैरवी?

इस पूरी कहानी का सबसे विस्फोटक हिस्सा यही है —
ओबीसी आरक्षण केस में मध्य प्रदेश सरकार ने DMK नेता P. Wilson को वकील नियुक्त किया है।

P. Wilson वही राज्यसभा सांसद हैं, जिन्होंने कहा था — “सनातन धर्म डेंगू और मलेरिया है।”

अब वही वकील हिंदुत्व की सरकार की तरफ़ से अदालत में पैरवी कर रहे हैं।

आदेश के मुताबिक, उन्हें हर सुनवाई के ₹5.5 लाख और हर कॉन्फ़्रेंस के ₹1.5 लाख फीस दी जाएगी।

यानी “सनातन नाश” की बात करने वाला व्यक्ति अब “सनातन समर्थक” सरकार का चेहरा बन गया है —
और यही विरोधाभास बीजेपी की विचारधारा पर सवाल खड़ा करता है।

बिहार से सीख या चेतावनी?

मोहन यादव का यह कदम ऐसे समय पर आया है जब बिहार चुनाव की बिसात पर बीजेपी पहले से ही जातीय समीकरणों में उलझी है।
वहाँ सवर्ण समाज नाराज़ है, और नीतीश कुमार ने ओबीसी-अति पिछड़े वोटरों को फिर से संगठित कर लिया है।
ऐसे में मध्य प्रदेश से जातीय आरक्षण का झंडा उठाना,
बीजेपी के लिए “बैकफायर पॉलिटिक्स” साबित हो सकता है।

मोदी बनाम मोहन: दो विज़न, एक पार्टी

मोदी का विज़न: वर्ग-आधारित एकता, विकास, राष्ट्रवाद।

मोहन यादव का विज़न: जाति-आधारित प्रतिनिधित्व, आरक्षण और पहचान की राजनीति।

अब सवाल यह है कि बीजेपी किस दिशा में जाएगी —
क्या पार्टी मोदी के “New BJP Vision” पर टिकी रहेगी या मोहन यादव के “27% आरक्षण प्रयोग” में फंस जाएगी?

निष्कर्ष: बीजेपी के लिए वैचारिक कसौटी

मोहन यादव का यह प्रयोग अगर सफल हुआ —
तो वे मध्य प्रदेश में “ओबीसी प्रतीक” के रूप में उभर सकते हैं।
लेकिन अगर यह उल्टा पड़ा —
तो यह वही गलती साबित होगी जो शिवराज सिंह चौहान ने 2018 में किसान और ओबीसी असंतोष के समय की थी।

क्योंकि मोदी की राजनीति का मंत्र है — “जाति नहीं, वर्ग।”
और मोहन यादव की रणनीति उस मंत्र के ठीक विपरीत चल रही है।

अब तय करेगा वक्त कि बीजेपी “मोदी मॉडल” पर टिकेगी या “मोहन मॉडल” पर फिसलेगी —
क्योंकि यही तय करेगा कि पार्टी राष्ट्रवाद की राजनीति बचाए रखेगी या जातिगत दलदल में फंस जाएगी।

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