बिहार चुनाव 2025: सीट बँटवारे की रस्साकशी
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासत का सबसे बड़ा सवाल यही है —
“सीटें किसे कितनी?”
दोनों बड़े गठबंधन — एनडीए और महागठबंधन — इसी सवाल पर फँसे हुए हैं।
बात सिर्फ़ सीटों की नहीं… यह बिहार की जातीय गणित और राजनीतिक अस्तित्व की असली लड़ाई है।
एनडीए का समीकरण: 100-100 की खींचतान
एनडीए में तस्वीर आंशिक रूप से साफ़ दिख रही है।
बीजेपी और जेडीयू — 100-100 सीटें तय।
बची हुई 43 सीटों पर घमासान — चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा के बीच।
चिराग पासवान:
“मैं मोदी का हनुमान हूँ।”
2020 में एनडीए से अलग होकर 135 सीटों पर लड़े, पर जीते सिर्फ़ 1।
लेकिन… जेडीयू को भारी नुकसान।
अब दावा — लोकसभा में 5 में से 5 सीटें जीतीं, स्ट्राइक रेट 100%।
इसलिए विधानसभा में ज़्यादा सीटों पर नज़र।
जीतनराम मांझी:
2020 में 7 सीटों पर लड़े, जीते 4।
अब माँग — 20 सीटें।
चेतावनी — “वरना 100 सीटों पर लड़ेंगे।”
यह दरअसल बर्गेनिंग टैक्टिक है, क्योंकि मान्यता प्राप्त दल के लिए न्यूनतम 8 सीटें ज़रूरी।
बीजेपी की दुविधा:
अगर मांझी अलग हुए, तो दलित वोट बिखरेंगे — और सीधा फायदा महागठबंधन को जाएगा।
अगर चिराग नाराज़ हुए, तो युवा–दलित समीकरण बिगड़ेगा।
महागठबंधन का सिरदर्द
महागठबंधन में उलझन और भी बड़ी है।
आरजेडी: लीड रोल चाहती है।
कांग्रेस: 70 सीटों की माँग।
सीपीआई-एमएल: 40 सीटें।
वीआईपी (मुकेश सहनी): 60 सीटों का दावा।
कांग्रेस की समस्या: 2020 में 70 पर लड़ी, जीती सिर्फ़ 19।
आरजेडी चाहती है — सीटें घटें।
लेकिन कांग्रेस कह रही है — “हम दलित, पिछड़े, मुसलमान, महिला उम्मीदवार देंगे।”
मुकेश सहनी:
खुद को कहते हैं “सन ऑफ मल्लाह।”
दावा — “11% वोट हमारा।”
पिछली बार एनडीए में थे, अब राजद के साथ।
लेकिन भरोसे की कमी बनी हुई है।
हॉटस्पॉट सीटें — जहाँ होगा असली संग्राम
मटिहानी: एलजेपी (आर) जीती, पर उम्मीदवार जेडीयू में चला गया। अब दोनों दावा कर रहे।
अलौली: पिछली बार आरजेडी जीती, अब दोनों गठबंधनों की खींचतान।
बछवाड़ा: कांग्रेस बनाम सीपीआई, हार–जीत का अंतर सिर्फ़ 464 वोट।
ये सीटें साबित करती हैं कि असली लड़ाई सिर्फ़ एनडीए बनाम महागठबंधन नहीं…
बल्कि गठबंधन के भीतर गठबंधन की है।
तेजस्वी यादव की रणनीति
16 सितंबर से तेजस्वी निकले — बिहार अधिकार यात्रा पर।
नारा — “वोटर अधिकार, जनता का अधिकार।”
लेकिन यात्रा में कोई सहयोगी दल साथ नहीं।
यानी तेजस्वी यह जताना चाहते हैं कि वे महागठबंधन का असली चेहरा हैं।
बीजेपी इसे बता रही है — “राहुल गांधी की यात्रा का जवाब।”
छोटे दल, बड़ा खेल
बिहार की राजनीति में कभी छोटे दलों को “संख्या पूरी करने वाला” माना जाता था।
लेकिन अब वही तय कर रहे हैं — गठबंधन की दिशा और दशा।
मांझी के बिना — दलित वोट टूटेगा।
चिराग के बिना — युवा-दलित और मोदी वोट कमजोर।
सहनी के बिना — निषाद वोट बिखरेंगे।
यानी 20–30 सीटों की माँग करने वाले दल… पूरे 243 सीटों की राजनीति को हिला रहे हैं।
निष्कर्ष
बिहार चुनाव 2025 से पहले तस्वीर साफ़ है:
एनडीए की चुनौती — चिराग और मांझी को साथ रखना।
महागठबंधन की चुनौती — कांग्रेस, माले और वीआईपी की भूख को संतुलित करना।
और सबसे बड़ा सवाल —
क्या ये छोटे दल अंत तक साथ रहेंगे?
या फिर चुनाव आते-आते, गठबंधन समीकरण फिर बदल जाएगा?
क्योंकि बिहार की राजनीति में एक कहावत है: “यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है… सिर्फ़ समीकरण बदलते हैं, और सत्ता उसी के साथ बदल जाती है।”



