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उज्जैन किसान आंदोलन और सिंहस्थ 2028: मोहन यादव की कुर्सी पर संकट

सिंहस्थ की धरती से उठी आग

उज्जैन की सड़कों पर 3 किलोमीटर लंबी ट्रैक्टर रैली। 2000 ट्रैक्टर और 10 हज़ार किसान। झंडों और नारों के बीच गूंजता संदेश —
“सिंहस्थ की परंपरा छेड़ी… तो उज्जैन बंद।”

यह सिर्फ़ आंदोलन नहीं था। यह मुख्यमंत्री मोहन यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट सिंहस्थ 2028 के खिलाफ़ किसानों का सीधा विद्रोह था।

किसानों की माँगें – ज़मीन से इज़्ज़त तक

किसान सिर्फ़ भूमि अधिग्रहण का विरोध नहीं कर रहे। उनकी चार मुख्य माँगें हैं:

MSP: गेहूँ का समर्थन मूल्य ₹6000 प्रति क्विंटल।

फसल बीमा: नकली सैटेलाइट सर्वे की जगह असली कटिंग के आधार पर।

बिजली सब्सिडी: ट्रांसफॉर्मर सब्सिडी योजना फिर से शुरू की जाए।

फसल सुरक्षा: आवारा पशुओं से फसल बचाने की व्यवस्था।

और अल्टीमेटम भी साफ़: दूध, सब्ज़ी और अनाज की सप्लाई बंद।

आंदोलन का नेतृत्व – RSS समर्थित किसान संघ

इस आंदोलन का चेहरा है भारतीय किसान संघ (BKS)। राष्ट्रीय महामंत्री मोहिनी मोहन मिश्र ने साफ कहा:

“मोदी-शाह हमसे बात करें… हम क्यों करें? जमीन हमारी… सिंहस्थ हमारी परंपरा।”

यानी यह सिर्फ़ किसानों का गुस्सा नहीं, बल्कि RSS का अप्रत्यक्ष दबाव भी है।

BJP के भीतर दुविधा

भाजपा नेता पारस जैन किसानों के मंच पर गए और समर्थन देकर लौट आए।
मतलब साफ़ — पार्टी के भीतर भी डर और दुविधा है।

सिंहस्थ 2028: ड्रीम या डूबता जहाज़?

मोहन यादव चाहते हैं कि सिंहस्थ को आधुनिक बनाया जाए।
सरकार की योजना: 1 लाख बीघा ज़मीन पर स्थायी संरचना।
किसानों की नज़र: खेती छीनने की साज़िश।

याद रखिए — यही सिंहस्थ आयोजन है, जिसने मोहन यादव को राजनीतिक पहचान दी थी। लेकिन अब वही आयोजन उनकी कुर्सी को संकट में डाल रहा है।

संघ का विकल्प – प्रहलाद पटेल

कुछ दिन पहले इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में बड़ा संकेत मिला।
मंच पर संघ प्रमुख मोहन भागवत, बगल में प्रहलाद सिंह पटेल।
भागवत ने कहा:

“मैं उत्सव मूर्ति नहीं हूँ, श्रद्धा का विषय हूँ।”

यह संदेश साफ़ था — संघ अब प्रहलाद पटेल को विकल्प के रूप में आगे ला रहा है।

शिवराज सिंह चौहान की वापसी?

शिवराज सिंह चौहान, जिन्हें किनारे किया गया था, अब सड़कों पर लौट चुके हैं।

नर्मदा परिक्रमा।

आदिवासी इलाक़ों के दौरे।

गाँव-गाँव चौपाल।

संघ के मंचों पर उनकी मौजूदगी बढ़ रही है।
यानी अगर मोहन यादव कमजोर पड़े, तो शिवराज भी दोबारा विकल्प बन सकते हैं।

सबसे बड़ा सवाल – मोहन यादव की चुप्पी

किसानों का गुस्सा। RSS का दबाव। प्रहलाद पटेल का मंच। शिवराज की सक्रियता।
लेकिन मोहन यादव?
चुप।
सिर्फ़ अफसर मैदान में।

किसानों का कहना है:

“अफसर पाँच साल बाद चले जाएंगे… किसान यहीं रहेंगे।”

यह दूरी और चुप्पी मोहन यादव की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल साबित हो सकती है।

निष्कर्ष: सिंहस्थ 2028 – मुकुट या संकट?

उज्जैन का किसान आंदोलन अब सिर्फ़ जमीन की लड़ाई नहीं।
यह लड़ाई है:

  • परंपरा बनाम विकास
  • RSS बनाम भाजपा
  • मोहन यादव बनाम विकल्प

सवाल यही है —
क्या सिंहस्थ 2028 मोहन यादव का मुकुट बनेगा?
या यही प्रोजेक्ट उनके राजनीतिक भविष्य को निगल जाएगा?

Akhileaks Verdict
akhileaks सच सामने लाता है। चाहे वो सत्ता को कितना भी चुभे।

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