लोकायुक्त की फाइलों में दब गई जनता की आवाज़: मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार की संस्कृति का सच
आज की पड़ताल है — उस सिस्टम की जो जनता से शिकायतें तो लेता है, लेकिन न्याय नहीं देता।
मध्यप्रदेश का लोकायुक्त संगठन — जिसे भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए बनाया गया था — अब खुद सवालों के घेरे में है। हर साल हज़ारों शिकायतें दर्ज होती हैं, लेकिन 90% शिकायतें ठंडे बस्ते में डाल दी जाती हैं।
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आंकड़े क्या कहते हैं?
लोकायुक्त की सालाना रिपोर्ट खुद गवाही देती है —
2018-19: 5177 शिकायतें, 4531 नस्तीबद्ध
2019-20: 5508, 4845 नस्तीबद्ध
2020-21: 4898, 4455 नस्तीबद्ध
2021-22: 4837, 4484 नस्तीबद्ध
2022-23: 4980, 4704 नस्तीबद्ध
2023-24: 4583, 4325 नस्तीबद्ध
2024-25: 4225, 3579 नस्तीबद्ध
सिर्फ़ अप्रैल से जून 2025 में 1225 शिकायतें आईं, जिनमें से 1092 बंद कर दी गईं।
यानी जनता की आवाज़ फाइलों की धूल में दफ़न हो जाती है।
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दर्ज प्रकरणों का सच
बीते आठ सालों में लोकायुक्त ने सिर्फ़ 1897 आपराधिक प्रकरण दर्ज किए।
रिश्वत: 1515 केस
अनुपातहीन संपत्ति: 144 केस
पद का दुरुपयोग: 238 केस
औसतन हर हफ़्ते 3–4 अफसर रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं।
लेकिन सवाल है — क्या भ्रष्टाचार कम हुआ?
जवाब है — नहीं।
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पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार
भ्रष्टाचार का सबसे नंगा खेल गाँव-गाँव में दिखता है।
रामपुर ग्राम पंचायत, शहडोल
समोसे और बूंदी पर 66,950 रुपये का बिल।
आंगनबाड़ी सामान पर 53,000 रुपये का खर्च।
जयसिंहनगर पंचायत
सिर्फ़ 2 फोटोकॉपी = 4000 रुपये।
भठिया पंचायत
2500 ईंटों का बिल = 1,25,000 रुपये।
यहाँ विकास नहीं, लूट का कारोबार चल रहा है।
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जनता की जेब पर असर
भ्रष्टाचार केवल फाइलों का खेल नहीं है।
इसका सीधा असर जनता की जिंदगी पर पड़ता है —
स्कूल का पैसा मिठाई-नमकीन में उड़ता है।
सड़क का बजट अफसर–ठेकेदार की जेब में चला जाता है।
बच्चों की किताबों का पैसा फर्जी बिलों में ग़ायब हो जाता है।
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कार्रवाई का नतीजा?
पंचायत के बिल वायरल होते हैं।
अफसर कहते हैं — “जांच करेंगे।”
नोटिस जारी होता है।
और फिर… कुछ नहीं होता।
यही सिस्टम की सबसे बड़ी त्रासदी है।
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असली सवाल
क्या भ्रष्टाचार सिर्फ़ पकड़े जाने तक ही अपराध है?
जब लोकायुक्त ही शिकायतें बंद कर दे, तो जनता कहाँ जाए?
क्या पंचायत स्तर पर जनता को सीधा ऑडिट का अधिकार मिलना चाहिए?
या हमें मान लेना चाहिए कि मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार अब एक स्थायी व्यवस्था बन चुका है?
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निष्कर्ष
ऊपर मुख्यमंत्री “भ्रष्टाचार मुक्त सरकार” की बातें करते हैं।
बीच में अफसर रिश्वत में पकड़े जाते हैं।
और नीचे पंचायतों में बूंदी–समोसे के नाम पर लाखों का ग़बन होता है।
यानी — भ्रष्टाचार अब अपराध नहीं, बल्कि संस्कृति बन चुका है।
यह थी Akhileaks की पड़ताल — लोकायुक्त से पंचायत तक भ्रष्टाचार का पूरा नेटवर्क।
आप क्या सोचते हैं? लोकायुक्त को नए अधिकार मिलने चाहिए या जनता को सीधा ऑडिट का हक़?



