2 करोड़ सदस्यता बनाम भगदड़ – भाजपा का असली चेहरा
मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है —
क्या भाजपा वाकई 2 करोड़ सदस्यता वाली पार्टी है?
या फिर, यह आंकड़ा सिर्फ़ प्रचार है और ज़मीन पर हालात बिल्कुल उलट?
सुसनेर: तोमर के गढ़ में दरार
आगर मालवा के सुसनेर से शुरू होती है कहानी।
यहाँ नगर परिषद अध्यक्ष लक्ष्मी सिसोदिया भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गईं।
उनके खिलाफ़ 12 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव लाया, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए, और भाजपा संगठन उन्हें बचा भी न सका।
कांग्रेस विधायक भैरोंसिंह परिहार ने सिसोदिया को गले लगाया और कांग्रेस ने यह दिखा दिया कि भाजपा का किला अब दरक चुका है।
शिवपुरी: सिंधिया का गढ़ हिला
दूसरी तरफ़ शिवपुरी — ज्योतिरादित्य सिंधिया का संसदीय क्षेत्र।
यहाँ भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के 18 पार्षदों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया।
भाजपा की नगर परिषद अध्यक्ष गायत्री शर्मा पर भ्रष्टाचार और विकास कार्यों में लापरवाही के आरोप लगे।
पार्षदों ने पहले हनुमान मंदिर में शपथ ली थी और फिर देशभक्ति गीतों के साथ रैली निकालकर कलेक्टर कार्यालय तक पहुँच गए।
यह नज़ारा बताता है कि सिंधिया का गढ़ भी अब खिसक रहा है।
खंडेलवाल के दावे और हकीकत
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल बार-बार कहते हैं —
“हम कार्यकारिणी बना रहे हैं, निगम-मंडलों में नियुक्तियाँ होंगी, संगठन मज़बूत है।”
लेकिन ज़मीन पर तस्वीर उलटी है।
एक तरफ़ अध्यक्ष कांग्रेस में भाग रही हैं, दूसरी तरफ़ पार्षद इस्तीफा दे रहे हैं।
भाजपा का संगठन जिस मजबूती का दावा कर रहा है, वह अराजकता और भगदड़ में तब्दील हो चुका है।
तोमर–सिंधिया पर सीधा असर
सुसनेर में नरेंद्र सिंह तोमर का सिस्टम फेल।
शिवपुरी में सिंधिया का गढ़ दरका।
भाजपा के ये दोनों बड़े चेहरे अपने-अपने इलाक़ों में पकड़ खोते नज़र आ रहे हैं।
यानी पार्टी की सबसे बड़ी ताकतें ही अब कमजोरी में बदल रही हैं।
कांग्रेस का नया सृजन
भाजपा के इस संकट के बीच कांग्रेस ने अपना काम तेज़ कर दिया है।
राहुल गांधी का सृजन अभियान गांव-गांव तक पहुँच चुका है।
प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी लगातार नए जिला अध्यक्ष नियुक्त कर रहे हैं और संगठन को नए सिरे से खड़ा कर रहे हैं।
भाजपा बार-बार कहती है “कांग्रेस कमजोर है”… लेकिन असलियत में कांग्रेस धीरे-धीरे cadre-based पार्टी का रूप ले रही है।
निष्कर्ष: कौन कमजोर, कौन मज़बूत?
भाजपा बाहर से मज़बूत दिख रही है —
लेकिन अंदर से टूटी और बिखरी है।
कांग्रेस बाहर से कमजोर दिख रही है —
लेकिन अंदर से रोज़ मज़बूत हो रही है।
अगर यही हाल रहा…
तो 2028 की कहानी कांग्रेस की जीत नहीं,
बल्कि भाजपा की अंदरूनी हार लिखेगी।



